
- निधन – 6 जुलाई 1854
- कार्य - फिजिसिस्ट, मैथ, मैटिशियन
- पढ़ने में नही था मन पर दे गये V = IR यानि ओम का नियम
आज हम ओम का नियम V = IR पढ़ते हैं, जो जार्ज सायमन द्वारा दिया गया एक बहुमूल्य सिधांत है | ये उन्ही के नाम पर मशहूर है| नियम कहता है की किसी भी कंडक्टर में बहाने वाला करेंट उस कंडक्टर के दोनों सिरों के पोटेंशियल डिफरेंस यानि विभावन्तर के समान होता है| बड़ी-बड़ी बिजली की कम्पनिया जार्ज सायमन के नियम पर ही आधारित है|
जार्ज सायमन
ओम का जन्म 16 मार्च 1789 को म्युनिक, जर्मनी में हुआ था | पिता जोहैन, ताले बनाने का काम करते
थे और माँ मरिया, दर्जी की बेटी थी | माता-पिता दोनों ही अशिक्षित थे, लेकिन वो
जार्ज और उनके भाई-बहनों को पढाया जिससे उन्हें जीवन में कठिनाइयाँ न झेलनी पड़े | पिता
जोहें ने कभी औपचारिक शिक्षा हासिल नही की थी लेकिन उन्होंने अपने दम पर ही हर
विषय पर खूब सारा ज्ञान अर्जित कर लिया था | जोहैन ने अपने दोनों बेटो को फिजिक्स,
केमिस्ट्री, मैथमैटीक्स और फिलॉसफी पढ़ते थे | स्कूल में जो पढाया जाता था, उससे
बेहतर उनके पिता घर पढ़ते थे | ये पिता जी का ऊँचे दर्जे का ज्ञान का ही नतीजा था
की गणित में जार्ज के ज्ञान स्तर भी बेहद ऊँचा हो गया था | बचपन से ही जार्ज मन
पढाई-लिखी में कम लगता था | उन्हें हर काम को प्रैटिकल तरीके से करना पसंद था | वे
जो पढ़ते, उसका पैटिकल करके जरुर देखते | 1805
में उनका दाखिला यूनिवर्सिटी ऑफ़
एर्लिंगन में हो गया | लेकिन उनका मन पढ़ने से ज्यादा स्केटिंग और विलीयार्डस में
लगता था | इस बात से पिता बेहद नाराज थे | उन्हें बुरा लगता था की जार्ज उस जगह की
कदर नही कर रहे | तंग आकर एक दिन उन्होंने आदेश दिया की तीन समेस्टर पूरा करते ही
वे यूनिवर्सिटी छोड़ दें |
1806 में जार्ज को स्विट्जरलैंड भेज दिया
गया जहाँ वे गणित में वहां के प्रोफेसर बन गये | उन्होंने घर पर भी गणित की पढाई
जरी रखी | बाद में इसी पढाई की वजह से उन्हें एर्लिंगन यूनिवर्सिटी के लेक्चरर बना
दिया गया | जार्ज सायमन ओम ने अपने एक प्रयोग में पाया था की वोल्टेज, करंट और
रेजिस्टेंस में एक संबंध होता है | रेजिस्टेंस की खोज उन्होंने ही की थी,जिसकी वजह
से आज कई कंडक्टर में से सबसे अच्छा कंडक्टर अलग करना संभव है | जिनका
रेजिस्टेंस(प्रतिरोध) सबसे कम है, वही सबसे अच्छा कंडक्टर हैं | सायमन के सिधान्तो
नाकारा भी गया | उनके नियम को गलत ठहराते हुए फिजिसिस्ट ऑगस्ट सिबैक ने एक दिन
उन्हें कड़वी बहस भी कर ली थी | 1852 में ओम म्युनिक यूनिवर्सिटी में लेक्चरर हो गये थे | यही बचपन से देखा
गया सपना भी था |
प्रेरणा – गुणवता कोई संयोग नही है |ये अच्छी नियत, लगन और बुद्धिमानी
का नतीजा है |
प्रेरणा – जब प्रेम और कौशल साथ काम करते हैं तब एक मास्टरपीस की
उम्मीद की जानी चाहिए |